जो भरा नहीं है भावों से,बहती जिसमे रस धार नहीं,वह ह्रदय नहीं पत्थर हैजिसको मधु से प्यार नहीं !!
बनती पकती माटी मेंजिस माटी में हम पले-बड़े,भांति-भांति के फलों से मिलकरस्वाद इसका यौवन चढ़ें !!
अधरों से छूते हीमुख पर आ जाती सच्चाई,बैर भाव को झुठला करप्याली में कैसी इठलाई !!
बुझे मन को देखो इसनेकैसा मदमस्त कर डाला,प्रफुल्लित हो तन-मन झूमेंचमत्कारी है ये हाला !!दोष न खोजो इसमें तुमहर बूँद इसकी गुणकारी,आगंतुक लगते अपनों सेमधुशाला फूलों की क्यारी !!
रह कर कैद बोतलों मेंआज़ादी देती हर जन को,तन सुन्दर,मन चंचल कर देखुशियाँ देती हर मन को !!रिश्तों में ये जोश भर देरहती उनमे तकरार नहीं,भरा नहीं जो भावों सेउसको मधु से प्यार नहीं !!
सुख-दुःख में साथ रहेनिष्काम संगनी, सी हाला,घूँट घूँट से प्यास बुझातीतर जाता पीने वाला !!कद्र न जाने इसकी वोरसपान जिसने किया नहीं,और भरा नहीं वो भावों सेक्योंकि,इसको कभी पिया नहीं !!
समर्थ
09.08.25