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9.8.25

सावन के पावन माह में और मदिरा की विरह वेदना में...

 
 
 
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमे रस धार नहीं,
वह ह्रदय नहीं पत्थर है
जिसको मधु से प्यार नहीं !!

बनती पकती माटी में
जिस माटी में हम पले-बड़े,
भांति-भांति के फलों से मिलकर
स्वाद इसका यौवन चढ़ें !!
 
 
अधरों से छूते ही
मुख पर आ जाती सच्चाई,
बैर भाव को झुठला कर
प्याली में कैसी इठलाई !!
 
  
बुझे मन को देखो इसने
कैसा मदमस्त कर डाला,
प्रफुल्लित हो तन-मन झूमें
चमत्कारी है ये हाला !!
 
दोष न खोजो इसमें तुम
हर बूँद इसकी गुणकारी,
आगंतुक लगते अपनों से
मधुशाला फूलों की क्यारी !!
 
रह कर कैद बोतलों में
आज़ादी देती हर जन को,
तन सुन्दर,मन चंचल कर दे
खुशियाँ देती हर मन को !!
 
रिश्तों में ये जोश भर दे
रहती उनमे तकरार नहीं,
भरा नहीं जो भावों से
उसको मधु से प्यार नहीं !!
 
                                    
सुख-दुःख में साथ रहे
निष्काम संगनी, सी हाला,
घूँट घूँट से प्यास बुझाती
तर जाता पीने वाला !!
 
कद्र न जाने इसकी वो
रसपान जिसने किया नहीं,
और भरा नहीं वो भावों से
क्योंकि,इसको कभी पिया नहीं !!

                                                                        समर्थ
                                                                         09.08.25



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