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25.8.10

समर्थदास के दोहे!!


     पत्नी पर दोहे  

पर-उपकार करी करी  जग मुआ, सेवक भय न कोय...
खुश कर ले जो पत्नी को, वही तो सेवक होए!!

जाने-अनजाने में, गल्ती कोई जो कीजिए...
चरण-पकड़  शीघ्र आप, क्षमा दान लीजिए!! 

अपनी-अपनी सब कहे, हमारी सुने न कोए...
डाट-डपट  के बीच में, प्रेम कहाँ से  होए!!

प्रेमिका-पत्नी दोउ  खड़े, किसको गले लगाए...
पहली कष्ट देत है,  दूजी  देये  रुलाये!!

पाप  हरे, संकट मिटे, ऐसा कुछ  दीजिए..
वरदान में आप हमे :  आज़ाद फिर से कीजिए!!




            

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