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28.5.26

आफत

 

पतियों कि जान को, आफत नई आई

24 घंटे / 7 दिन, दिखती सिर्फ लुगाई,

 

रोना जी भर तो दूर, अब सिसिकना भी मुश्किल

करोना कर गया मजबूर, कहीं खिसिकना भी मुश्किल,

 

पहले थी आज़ादी खुलकर जीने की

भवरों सा मंडराकर, मधु-रस पीने की,

 

आती है रुलाई, मुझको बंद दीवारों में

 बुलबुल नहीं चहकती,बागियाँ और बाज़ारों में,

 

महामारी ये हौले से देखो कितनी विकराल हुई

धैर्य शक्ति पतियों की विकसित कितनी कमाल हुई,

 

मुहँ बंद आँख खुली बस इतनी सी पहचान रही

पत्नी-भय से ग्रसित, पड़ोसन भी यह जान गयी,

 

कलयुग में प्रभु, देखो कैसे हम बेहाल हुए

बिन पेंदे के लोटे और पिटे हुए थाल हुए,

 

कृपा हम पर जल्दी से, मालिक मेरे बरसाओ,

लॉक डाउन खुलवा कर,जीवन पह्लसे सा करवाओ !!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



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