टूट
कर हमसे ही टुकड़ा, एक ऐसा ऐठा
डर
छुपाकर, गोद में चीन की जा बैठा
ज्ञात
नहीं है दुष्ट को,यह हिमाक़त पड़ जाएगी भारी
‘रूस-भारत’
की जोड़ी ऐसी, जैसे ‘जय-वीरू’ की यारी !
रूखी रोटी खा कर जैसे-तैसे,जीवन यापन तो कर लोगे
कंठ सुखा अपनों का क्या? आँखों का पानी भी हर लोगे !
जतन
जितने चाहे कर लो,अंत तुम्हारा लिख देंगे
खैरात के यह गोला-बारूद,मोहलत तुमको क्या देंगे
खेल-खेल में मिट जाओगे, नादानी छोड़ो यारा ..
नतमस्तक
हो समर्पण कर, जीवनदान पाओ दुबारा !!
समर्थ रस्तोगी
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